रिकॉर्ड के रखरखाव की जिम्मेदारी अधिकारियों की, दस्तावेज गायब होने पर शिक्षकों को सजा देना गलत, पूरा मानदेय देने का आदेश
Palamu Para Teachers: झारखंड उच्च न्यायालय ने पलामू जिले के बर्खास्त पारा शिक्षकों को बहुत बड़ी न्यायिक राहत प्रदान की है। हाईकोर्ट ने नौडीहा बाजार और छतरपुर प्रखंड में कार्यरत याचिकाकर्ता पारा शिक्षकों की सेवा समाप्ति संबंधी आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकल पीठ ने पलामू के उपायुक्त सह प्रथम अपीलीय प्राधिकार द्वारा 16 जनवरी 2025 को जारी सेवा समाप्ति आदेश को रद्द करते हुए सभी शिक्षकों को तत्काल सेवा में योगदान कराने का सख्त आदेश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने शिक्षकों को उनके पक्ष में फैसला आने की तिथि से लेकर पुनर्बहाली तक का पूरा मानदेय और वेतन भुगतान करने का निर्देश भी जारी किया है।
Palamu Para Teachers: प्रशासनिक लापरवाही की मार, अदालत ने कहा- रिकॉर्ड गायब होने की सजा शिक्षकों को नहीं
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान बेहद तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि चयन और नियुक्ति से संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों तथा प्रखंड स्तरीय अनुशंसा का सुरक्षित रखरखाव करना प्रशासनिक पदाधिकारियों की वैधानिक जिम्मेदारी थी। यदि सरकारी दफ्तर से फाइलें गायब हो गई हैं या रिकॉर्ड का मिलान नहीं हो पा रहा है, तो इसकी सजा 16 साल से अधिक समय तक ईमानदारी से पढ़ाने वाले शिक्षकों को कतई नहीं दी जा सकती।
अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि चयन अभिलेखों के अभाव का ठीकरा शिक्षकों के सिर फोड़ना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ है। अदालत ने पलामू जिला प्रशासन को आदेश दिया है कि आदेश की प्रति प्रस्तुत होने के चार सप्ताह के भीतर सभी प्रभावित पारा शिक्षकों को उनके मूल विद्यालयों में योगदान कराया जाए।
Palamu Para Teachers: मिलेगा पूरा बकाया मानदेय, कोर्ट ने कहा लागू नहीं होगा ‘नो वर्क नो पे’
उच्च न्यायालय ने सेवा समाप्ति की अवधि के दौरान के वित्तीय अधिकारों पर भी अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अनुशासनात्मक-सह-प्रशासनिक समिति द्वारा शिक्षकों के पक्ष में लिए गए निर्णयों की तिथि यानी 13 मार्च 2024 और 27 अप्रैल 2024 से लेकर पुनर्बहाली तक का पूरा बकाया वेतन या मानदेय दिया जाए। इसके अलावा शिक्षकों को सभी परिणामी सेवा लाभ भी प्रदान किए जाएंगे।
इस वित्तीय आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए संबंधित विभाग को आठ सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया गया है। कोर्ट ने साफ किया कि जब शिक्षकों को प्रशासनिक गलती और अवैध आदेश से जबरन काम करने से रोका गया, तो ऐसी परिस्थिति में ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ (नो वर्क नो पे) का नियम किसी भी सूरत में लागू नहीं होगा। अदालत ने शिक्षकों की ओर से दाखिल सभी रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया।
2006 से 2008 के बीच हुई थी बहाली, 512 शिक्षकों के चयन पर 16 साल बाद उठा था विवाद
मामले की पृष्ठभूमि काफी लंबी है। याचिकाकर्ता पारा शिक्षकों की नियुक्ति वर्ष 2006 से 2008 के बीच सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत की गई थी। इसके लिए बाकायदा विज्ञापन जारी हुआ था और संबंधित ग्राम सभाओं की आमसभा ने उनके नामों की विधिवत अनुशंसा की थी। प्रखंड कार्यालय में सत्यापन के बाद शिक्षकों के साथ अनुबंध किया गया था। शिक्षक 16 वर्ष से अधिक समय तक निर्बाध सेवा दे चुके थे। वर्ष 2012 और फिर 2019 में कराई गई दो अलग-अलग जांचों के निष्कर्षों में भारी अंतर पाया गया।
इसके बाद विधानसभा की विशेष समिति की अनुशंसा पर 19 मार्च 2021 को एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की गई थी। समिति ने 30 नवंबर 2022 की रिपोर्ट में छतरपुर के 302 और नौडीहा बाजार के 210, कुल 512 पारा शिक्षकों की अनुशंसा को दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं माना था। झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद (जेईपीसी) की 64वीं बैठक में प्रक्रियागत त्रुटि वाले शिक्षकों को नियमावली 2015 के तहत लाभ देने की बात कही गई थी, लेकिन पलामू प्रशासन ने एकतरफा सेवा समाप्त कर दी थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया है।
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