spot_img
spot_img
HomeझारखंडRanchi News: झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, UCIL जादूगोड़ा की महिला कर्मचारी...

Related Posts

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, UCIL जादूगोड़ा की महिला कर्मचारी की बर्खास्तगी बरकरार; रासायनिक जांच रिपोर्ट में हेरफेर का था मामला

Ranchi News: केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण का आदेश रद्द, अदालत ने कहा- गंभीर कदाचार के मामले में बर्खास्तगी की सजा असंगत नहीं

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL), जादूगोड़ा की महिला कर्मचारी टी. नायक (थानुश्री नायक) की सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण (Central Industrial Tribunal), धनबाद के उस पुराने फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें महिला कर्मचारी की बर्खास्तगी को अवैध करार देते हुए उसे पूरे बकाया वेतन और अन्य वित्तीय लाभ के साथ दोबारा सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया था।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि रासायनिक जांच परिणामों में हेरफेर कर कंपनी को आर्थिक क्षति पहुँचाना एक बेहद गंभीर कदाचार है, ऐसे मामलों में बर्खास्तगी की सजा को अनुचित नहीं कहा जा सकता।

क्या था पूरा मामला और आरोप?

मामले के अनुसार, थानुश्री नायक यूसीआईएल में साइंटिफिक असिस्टेंट ग्रेड-1 के पद पर कार्यरत थीं। उन्हें प्रयोगशाला (Laboratory) में ‘बर्न्ट लाइम’ (Burnt Lime) के रासायनिक विश्लेषण की रिपोर्ट तैयार कर सहायक अधीक्षक के पास भेजने का दायित्व सौंपा गया था।

जांच के दौरान खुलासा हुआ कि 3 दिसंबर 2007 से 18 अप्रैल 2008 के बीच उन्होंने बर्न्ट लाइम के करीब 60 से 65 फीसदी नमूनों की वास्तविक जांच रिपोर्ट में हेरफेर किया और उसमें कैल्शियम ऑक्साइड (CaO) की मात्रा को मानक से अधिक दर्शाया। चूंकि बर्न्ट लाइम की गुणवत्ता के आधार पर ही कंपनी सप्लायर को भुगतान करती थी, इसलिए इस फर्जी रिपोर्ट के जरिए खराब गुणवत्ता का माल सप्लाई करने वाली फर्म ‘मेसर्स श्याम केमिकल्स’ को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचाया गया और UCIL को भारी वित्तीय नुकसान हुआ।

शुरुआत में कर्मचारी ने स्वीकार की थी गड़बड़ी

विभागीय दस्तावेजों के मुताबिक, 28 अप्रैल 2008 को जब स्पष्टीकरण मांगा गया, तब महिला कर्मचारी ने लिखित रूप में बर्न्ट लाइम के परिणामों में हेरफेर करने की बात कबूल की थी और अपनी गलती के लिए माफी मांगते हुए राहत की अपील की थी। इसके बाद 2 मई 2008 को एक अन्य पत्र में उसने यह भी बताया था कि सप्लायर ने व्यक्तिगत रूप से मिलकर परिणामों को बदलकर अधिक दिखाने का अनुरोध किया था।

हालांकि, औपचारिक आरोप पत्र जारी होने के बाद 19 मई 2008 को उसने अपना रुख बदलते हुए दावा किया कि सहायक अधीक्षक के दबाव और डर के कारण उसने वे पत्र लिखे थे। विभागीय जांच में उसकी इस दलील को खारिज कर दिया गया और जांच अधिकारी ने दस्तावेजों व गवाहों के आधार पर सभी छह आरोपों को प्रमाणित पाया, जिसके बाद अनुशासनिक प्राधिकार ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया था।

हाईकोर्ट ने न्यायाधिकरण के फैसले को बताया त्रुटिपूर्ण

इस मामले में केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण, धनबाद ने 21 मार्च 2014 को विभागीय जांच को निष्पक्ष माना था, लेकिन 21 जनवरी 2015 को दिए गए अपने मुख्य फैसले में कर्मचारी की बर्खास्तगी रद्द कर दी थी। न्यायाधिकरण का मानना था कि कर्मचारी के स्वीकारोक्ति वाले पत्र दबाव में लिखवाये गए थे और कंपनी को वास्तविक नुकसान का ठोस प्रमाण नहीं है।

झारखंड हाईकोर्ट ने न्यायाधिकरण के इस रुख को त्रुटिपूर्ण और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 11-ए के तहत न्यायाधिकरण को साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन का अधिकार है, लेकिन इसका उपयोग न्यायिक विवेक के साथ होना चाहिए। जांच अधिकारी के निष्कर्ष स्पष्ट रूप से दस्तावेजों पर आधारित थे, ऐसे में न्यायाधिकरण केवल अपीलीय अदालत की तरह उन निष्कर्षों को नहीं पलट सकता।

इन तमाम टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने औद्योगिक न्यायाधिकरण के आदेश को खारिज करते हुए यूसीआईएल प्रबंधन द्वारा दी गई बर्खास्तगी की सजा को बहाल कर दिया है।

Latest Posts