करीब 2000 चयनित अभ्यर्थियों की नौकरी सुरक्षित, जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने कहा- सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को दरकिनार नहीं कर सकती सरकार
JSSC CGL Verdict: झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के एक बड़े फैसले को पलटते हुए हजारों चयनित अभ्यर्थियों को ऐतिहासिक राहत दी है। झारखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकल पीठ ने शुक्रवार को बहुचर्चित JSSC-CGL (विज्ञापन संख्या 10/2023) की संपूर्ण परीक्षा और नियुक्ति प्रक्रिया को रद्द करने संबंधी राज्य सरकार की 18 अगस्त 2026 की अधिसूचना को पूरी तरह निरस्त कर दिया। उच्च न्यायालय के इस कड़े फैसले के बाद सेवा में कार्यरत करीब 1932 से 2000 अभ्यर्थियों की नौकरी पूरी तरह सुरक्षित हो गई है और वे अपने पदों पर विधिवत कार्य करते रहेंगे।
JSSC CGL Verdict: सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला, दोषी और निर्दोष को अलग करना जरूरी
फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस संदर्भ में पूर्व में पारित किया गया आदेश पूरी तरह प्रभावी और बहाल रहेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी राज्य सरकार या प्रशासनिक प्राधिकार देश की शीर्ष अदालत द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को दरकिनार नहीं कर सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार द्वारा संपूर्ण विज्ञापन को एक झटके में रद्द करने का निर्णय प्रकाश कुमार व अन्य के मामले में झारखंड हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ऐतिहासिक न्यायिक फैसलों की मूल भावना के सर्वथा विपरीत है।
अदालत ने कहा कि जब तक आपराधिक अनुसंधान मुकम्मल नहीं हो जाता, तब तक पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को ही निरस्त कर देना कानूनी रूप से अनुचित है। जब तक जांच में दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों के बीच फर्क स्पष्ट न हो जाए, तब तक नियुक्त हो चुके निर्दोष अभ्यर्थियों को बिना किसी नियम या आधार के सेवा से बाहर करना न्यायसंगत नहीं है। जो अभ्यर्थी अनुसंधान में स्पष्ट रूप से दोषी चिन्हित होंगे, केवल उन्हें ही नौकरी से बाहर का रास्ता देखना होगा।
JSSC CGL Verdict: वकीलों की जोरदार बहस, अदालत ने रमेश उरांव समेत दर्जनों याचिकाओं का किया निपटारा
झारखंड हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस नियुक्ति को रद्द किए जाने के सरकारी आदेश को चुनौती देने वाली रमेश उरांव व अन्य, आकाश गौरव व अन्य, निरोज खेस व अन्य सहित दर्जनों अभ्यर्थियों द्वारा दायर अलग-अलग याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। सुनवाई के दौरान प्रार्थियों की ओर से देश के कई नामचीन वकीलों ने पक्ष रखा। इनमें वरीय अधिवक्ता राजीव रंजन, सुप्रीम कोर्ट के वरीय अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण, अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा और अधिवक्ता अमृतांश वत्स शामिल थे।
प्रार्थियों के वकीलों ने दलील दी कि JSSC-CGL का मामला पहले ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से अंतिम रूप से निष्पादित हो चुका था। शीर्ष अदालत ने साफ व्यवस्था दी थी कि नियुक्तियां आपराधिक अभियोजन (क्रिमिनल प्रॉसिक्यूशन) के अंतिम परिणाम पर निर्भर रहेंगी। ऐसे में उसी मामले को दोबारा कैबिनेट में उठाकर केवल आंदोलनकारी छात्रों को संतुष्ट करने के लिए राजनीतिक दबाव में पूरी नियुक्ति रद्द करना अदालत की सीधी अवमानना थी।
पेपर लीक और एजेंसी की धांधली पर सरकार की दलीलें खारिज, कैबिनेट के फैसले को झटका
दूसरी तरफ, राज्य सरकार की ओर से पेश हुईं सुप्रीम कोर्ट की वरीय अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने परीक्षा रद्द करने के कैबिनेट के फैसले का पुरजोर बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि परीक्षा में बड़े पैमाने पर पेपर लीक, संस्थागत विफलता और भ्रष्टाचार सामने आया था। जिस एजेंसी को परीक्षा आयोजित करने की जिम्मेदारी दी गई थी, उसने प्रश्नपत्र लीक होने दिया। अभ्यर्थियों को नेपाल और अन्य राज्यों में ले जाकर उत्तर रटवाए गए थे।
सरकार का तर्क था कि सीआईडी अनुसंधान में परीक्षा में गड़बड़ी के पुख्ता डिजिटल साक्ष्य मिले हैं, जिससे परीक्षा की शुचिता समाप्त हो गई थी। इसलिए पब्लिक कॉन्फिडेंस (जनविश्वास) बहाल करने के लिए कैबिनेट ने पूरी परीक्षा निरस्त की थी। हालांकि, अदालत ने सरकार की इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि जांच के नाम पर बिना दोष साबित हुए निर्दोषों की आजीविका नहीं छीनी जा सकती।
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