- बदलती जीवनशैली ने छीनी हरियाली
Jharkhand: कभी घरों के आंगन और बगीचे सिर्फ हरियाली ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक औषधालय का काम करते थे। लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण और कंक्रीट के विस्तार ने इस परंपरा को लगभग खत्म कर दिया है।
औषधीय पौधों का खत्म होता अस्तित्व
पहले लोग अपने घरों के चारों ओर झाड़ीदार औषधीय पौधों की घेराबंदी करते थे, जो सुरक्षा और इलाज दोनों में काम आते थे। आज ये पौधे न सिर्फ बागानों से, बल्कि समाज से भी धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, वनों की कटाई, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
ये पौधे थे घर-घर की पहचान
पहले हर घर में कुछ खास औषधीय पौधे आम होते थे, जैसे—
- निर्गुंडी (सिंदुरवार) – दर्द निवारण में उपयोगी
- वासा (वासक) – खांसी और कफ के इलाज में कारगर
- आयापान – पेट संबंधी बीमारियों में लाभदायक
- नागदौना, कनेर, नागफनी, हड्डजोड़ – विभिन्न रोगों के उपचार में उपयोगी
ये पौधे प्राकृतिक रूप से कीट-प्रतिरोधी भी होते थे, जिससे बगीचों की सुरक्षा भी होती थी।
अब बगीचों की जगह कंक्रीट की दीवारें
विशेषज्ञ बताते हैं कि पहले टाटा स्टील के पुराने क्वार्टर इलाकों में औषधीय पौधों की घेराबंदी आम दृश्य हुआ करती थी। लेकिन अब इनकी जगह ईंट और सीमेंट की दीवारों ने ले ली है, जिससे यह पारंपरिक व्यवस्था पूरी तरह खत्म होती जा रही है।
नई पीढ़ी हो रही अनजान
इस बदलाव का असर गांवों तक भी पहुंच गया है। अब लोग बागानों की घेराबंदी भी कंक्रीट से करने लगे हैं, जिससे नई पीढ़ी इन पौधों के महत्व से अनजान होती जा रही है।
जागरूकता अभियान की पहल
Ananda Marga और Prevention of Cruelty to Animals जैसी संस्थाएं इस दिशा में जागरूकता फैला रही हैं। सामाजिक कार्यकर्ता सुनील आनंद का कहना है कि पर्यावरण और मानव जीवन की सुरक्षा के लिए इन औषधीय पौधों को फिर से अपनाना जरूरी है।
पृथ्वी दिवस पर उठता बड़ा सवाल
Earth Day के मौके पर यह सवाल और अहम हो जाता है—क्या हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी प्राकृतिक विरासत को पूरी तरह खो देंगे? विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे-छोटे प्रयास, जैसे घरों में औषधीय पौधे लगाना, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।



