बीएसएफसी को तीन सप्ताह में कब्जा सौंपने का आदेश, बिमला डे को मिली बड़ी राहत
Jamshedpur Hotel Sahu: नीलामी विवाद पर बड़ा फैसला आया। झारखंड हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक आदेश सुनाया है। अदालत ने वित्तीय निगम की मांग खारिज कर दी। बिहार राज्य वित्तीय निगम की मांग रद्द हुई। निगम ने 83,14,484 रुपये की मांग की थी। कोर्ट ने इस मांग को पूरी तरह अनुचित माना। अदालत ने याचिकाकर्ता बिमला डे को राहत दी। तीन सप्ताह के भीतर संपत्ति सौंपने का निर्देश है।
Jamshedpur Hotel Sahu: 2008 में बिश्वनाथ चंद्र डे ने लगाई थी बोली
होटल साहू साझेदारी फर्म ने बीएसएफसी से कर्ज लिया था। कर्ज न चुकाने पर संपत्ति की नीलामी हुई। वर्ष 2008 में नीलामी प्रक्रिया आयोजित हुई थी। बिमला डे के पति बिश्वनाथ चंद्र डे ने बोली लगाई। उनकी 91 लाख रुपये की बोली सबसे ऊंची रही। उन्होंने 25 फीसदी यानी 22.75 लाख रुपये जमा किए। इसके बाद मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा था। पटना हाईकोर्ट ने 26 नवंबर 2015 को चुनौती खारिज की। अदालत ने बिक्री प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति दी।
Jamshedpur Hotel Sahu: 2016 में पुनर्वैध हुआ था नीलामी आदेश
बीएसएफसी ने 29 अगस्त 2016 को आदेश पुनर्वैध किया। निगम ने 17.06 लाख रुपये और जमा कराए। याचिकाकर्ता के पति ने बैंक ड्राफ्ट से भुगतान किया। इसके बाद 28 अक्टूबर 2016 को समझौता हुआ। बिक्री सह शेष ऋण भुगतान का अनुबंध हुआ। सभी औपचारिकताएं पूरी होने पर भी कब्जा नहीं मिला। खरीदार समझौते की सभी शर्तें पूरी कर चुका था। इसके बावजूद निगम ने कब्जा देने में देरी की।
Jamshedpur Hotel Sahu:कब्जा दिलाने में विफल रहे निगम के अधिकारी
कब्जा दिलाने के लिए प्रशासनिक आदेश भी जारी हुए। जमशेदपुर एसडीएम ने 26 दिसंबर 2016 को आदेश निकाला। मजिस्ट्रेट और पुलिस बल की तैनाती की गई। लेकिन 29 दिसंबर 2016 को निगम अधिकारी नहीं पहुंचे। फिर 16 फरवरी 2017 को अधिकारी काफी देर से आए। इससे कब्जा दिलाने की प्रक्रिया अधूरी रह गई। धालभूमगढ़ एसडीएम ने 15 मई 2017 को पत्र लिखा। उन्होंने निगम अधिकारियों की लापरवाही पर सवाल खड़े किए।
निगम ने संपत्ति मूल्य बढ़ने पर मांगी थी अतिरिक्त रकम
बीएसएफसी की ओर से अधिवक्ता अशोक कुमार यादव रहे। निगम ने ‘जहां है जैसा है’ का तर्क दिया। प्रशासन से पूरा सहयोग न मिलने का दावा किया। निगम ने संपत्ति के दाम बढ़ने की दलील दी। 11 सितंबर 2019 को 83 लाख की मांग भेजी। याचिकाकर्ता ने इसे पूरी तरह मनमाना बताया। खरीदार ने कहा कि उनकी कोई गलती नहीं थी। निगम अपनी निष्क्रियता का बोझ खरीदार पर नहीं डाल सकता।
अपनी विफलता का फायदा नहीं उठा सकता निगम
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनीं। अदालत ने निगम की कार्यशैली पर सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा, खरीदार शर्तों का पालन कर रहा था। निगम अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह नाकाम रहा। अपनी गलती का फायदा उठाकर अतिरिक्त मांग करना गलत है। हाईकोर्ट ने 11 सितंबर 2019 का मांग पत्र रद्द किया। अदालत ने तीन सप्ताह में कब्जा दिलाने का आदेश दिया। खरीदार के साथ हुआ 2016 का समझौता लागू रहेगा।
14 अक्टूबर से होगी गणना, किरायेदारों से मिलेगा किराया
अदालत ने समझौते की समय-सीमा पर स्थिति साफ की। समय-सीमा की गणना 14 अक्टूबर 2026 से मानी जाएगी। दोनों पक्षों को समझौते की शर्तों का पालन करना होगा। संपत्ति में मौजूद किराएदार अब बिमला डे के अधीन होंगे। किराएदारों को सारा किराया याचिकाकर्ता को देना होगा। मकान मालिक के रूप में उन्हें सभी विधिक अधिकार मिलेंगे। वे किराएदारों के संबंध में कानूनी कदम उठा सकेंगी। इस फैसले से वर्षों पुराना कानूनी विवाद खत्म हुआ।
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