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JSSC Normalization | स. आचार्य परीक्षा में नॉर्मलाइजेशन पर हाईकोर्ट सख्त

JSSC Normalization | झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) द्वारा सहायक आचार्य नियुक्ति परीक्षा (विज्ञापन संख्या-13/2023) में अपनाई गई नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया अब न्यायिक जांच के दायरे में आ गई है। झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) ने परीक्षा परिणाम तैयार करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए आयोग से शपथ-पत्र के माध्यम से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने विशेष रूप से समान रॉ अंक पाने वाले अभ्यर्थियों के अलग-अलग नॉर्मलाइज्ड स्कोर और अलग रॉ अंक होने के बावजूद समान अंतिम स्कोर दिए जाने के आधार पर स्पष्टीकरण तलब किया है।

JSSC Normalization | समान रॉ अंक पर अलग स्कोर कैसे?

मंगलवार को न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत में गिरिधर प्रसाद एवं अन्य अभ्यर्थियों की याचिकाओं पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने जेएसएससी से पूछा कि यदि दो अभ्यर्थियों ने समान परिस्थितियों में परीक्षा दी और दोनों के रॉ अंक भी समान हैं, तो उनके नॉर्मलाइज्ड अंक अलग-अलग कैसे निर्धारित किए गए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि एक ही शिफ्ट में परीक्षा देने वाले दो अभ्यर्थियों के रॉ अंक 69-69 थे, लेकिन एक का नॉर्मलाइज्ड स्कोर 17 और दूसरे का 34 दर्शाया गया। इस उदाहरण पर अदालत ने आयोग से स्पष्ट जवाब देने को कहा कि समान रॉ अंक होने के बावजूद इतना बड़ा अंतर किस गणना पद्धति के आधार पर किया गया।

JSSC Normalization | अलग रॉ अंक पर समान परिणाम पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया। न्यायालय ने पूछा कि यदि अलग-अलग अभ्यर्थियों के रॉ अंक अलग हैं, तो क्या नॉर्मलाइजेशन के बाद उनका अंतिम स्कोर समान हो सकता है। यदि ऐसा हुआ है, तो इसकी गणना का वैज्ञानिक और तकनीकी आधार क्या है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि आयोग द्वारा अपनाई गई नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता के मानकों पर खरी नहीं उतरती। उनका कहना है कि परिणाम तैयार करने की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट रूप से सार्वजनिक नहीं की गई, जिससे अभ्यर्थियों के बीच भ्रम और असंतोष पैदा हुआ।

जेएसएससी को शपथ-पत्र दाखिल करने का निर्देश

अदालत ने दोनों बिंदुओं पर जेएसएससी को शपथ-पत्र के माध्यम से विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। न्यायालय यह जानना चाहता है कि नॉर्मलाइजेशन का कौन-सा गणितीय मॉडल अपनाया गया और उसके आधार पर परिणाम कैसे तैयार किए गए।

विशेषज्ञों का मानना है कि बहु-शिफ्ट परीक्षाओं में नॉर्मलाइजेशन का उद्देश्य विभिन्न प्रश्नपत्रों के कठिनाई स्तर का संतुलन बनाना होता है। हालांकि, यदि समान परिस्थितियों में शामिल अभ्यर्थियों के परिणामों में असामान्य अंतर दिखाई देता है, तो उसकी पारदर्शी व्याख्या आवश्यक हो जाती है।

छह अगस्त को होगी अगली सुनवाई

मामले की अगली सुनवाई छह अगस्त को निर्धारित की गई है। अब निगाहें जेएसएससी के जवाब पर टिकी हैं। आयोग की ओर से दाखिल शपथ-पत्र के आधार पर अदालत आगे यह तय करेगी कि नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया में अपनाई गई पद्धति न्यायसंगत और पारदर्शी थी या नहीं। इस मामले का असर सहायक आचार्य नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है।

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