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Ranchi News: 8 साल से लापता बच्ची पर हाईकोर्ट सख्त, जांच में देरी पर मांगा जवाब

गुमला की बच्ची की तलाश में पुलिस की कार्यशैली पर उठे सवाल, DLSA को रिपोर्ट भेजने में देरी पर सरकार से जवाब तलब

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट में गुमला से वर्ष 2018 से लापता बच्ची के मामले में सुनवाई के दौरान पुलिस की जांच और अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठे। अदालत ने अनुसंधान की प्रगति रिपोर्ट जिला विधिक सेवा प्राधिकार (DLSA), गुमला को देर से भेजे जाने पर नाराजगी जताई। सरकार की ओर से इस संबंध में शपथ पत्र दाखिल किया गया। इसमें बताया गया कि अनुसंधानकर्ता ने 23 अक्टूबर 2026 को रिपोर्ट DLSA को भेजी थी। रिपोर्ट भेजने में हुई देरी के लिए सरकार ने अदालत से बिना शर्त माफी मांगी। अदालत ने इस देरी और पूर्व अधिकारियों को दी गई क्लीन चिट के आधार पर सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है।

Ranchi News: रिपोर्ट भेजने में देरी पर कोर्ट ने जताई नाराजगी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि जब लापता बच्ची के मामले में नियमित प्रगति रिपोर्ट DLSA को भेजना जरूरी था, तो इसमें इतनी देरी क्यों हुई। अदालत के अनुसार, बच्ची के लापता रहने की स्थिति में प्राथमिकी दर्ज होने के चार महीने के भीतर रिपोर्ट भेजी जानी चाहिए थी। इसके बाद प्रत्येक तीन महीने पर अनुसंधान की प्रगति रिपोर्ट DLSA को उपलब्ध कराई जानी थी।

कोर्ट ने यह भी पूछा कि वन मैन कमेटी ने रिपोर्ट भेजने में हुई इस देरी पर विचार क्यों नहीं किया। वर्ष 2018 से 2022 के बीच गुमला में पदस्थापित तत्कालीन पुलिस अधीक्षकों और अनुसंधानकर्ताओं को किस आधार पर क्लीन चिट दी गई। अदालत ने इस पूरे मामले पर गृह विभाग के माध्यम से राज्य सरकार को शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है।

Ranchi News: वन मैन कमेटी की भूमिका पर भी उठे सवाल

अदालत ने जानना चाहा कि जब जांच की प्रगति रिपोर्ट समय पर नहीं भेजी गई, तो संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के दौरान इस तथ्य को क्यों नजरअंदाज किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच में हुई देरी और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया की भी समीक्षा जरूरी है।

प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता शशांक शेखर ने पहले की सुनवाई में भी इस मुद्दे को उठाया था। उन्होंने अदालत को बताया था कि सरकार के शपथ पत्र में वर्ष 2018 से 2022 तक गुमला में पदस्थापित तत्कालीन एसपी और अनुसंधानकर्ताओं को क्लीन चिट दी गई है। जबकि उनके अनुसार, प्राथमिकी दर्ज करने में भी देरी हुई थी। सरकार की ओर से बच्ची के लापता होने से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्यों को भी स्पष्ट नहीं किया गया था।

मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी और पुलिस कस्टडी पर सवाल

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि मामले की मुख्य आरोपी भूखली लकड़ा को 6 जून 2026 को गिरफ्तार किया गया था। उससे पूछताछ के लिए पुलिस कस्टडी की मांग करते हुए आवेदन दिया गया है।

इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि गिरफ्तारी के चार-पांच महीने बाद पुलिस कस्टडी मांगना कितना उचित है। कोर्ट ने गुमला के एसपी को जवाब दाखिल कर यह बताने का निर्देश दिया कि बच्ची के लापता होने के मामले में जांच सही तरीके से क्यों नहीं की गई। अनुसंधान में ढिलाई बरतने के कारणों की जानकारी भी मांगी गई है।

गुजरात में हुआ था संदिग्धता परीक्षण

मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से आरोपी के गुजरात के गांधीनगर में हुए परीक्षण का भी उल्लेख किया गया। बताया गया कि वहां उसका सस्पेक्ट डिटेक्शन टेस्ट किया गया था। इस परीक्षण में उसे संदिग्ध पाया गया है।

इससे पहले अदालत को बताया गया था कि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से आरोपी का नार्को टेस्ट नहीं हो सका। इसके बाद गुजरात के गांधीनगर स्थित संबंधित संस्थान में सस्पेक्ट डिटेक्शन टेस्ट सहित दो पूरक परीक्षण कराए गए थे। अदालत में सरकार की ओर से इन परीक्षणों से जुड़ी जानकारी रखी गई।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी परीक्षण में संदिग्ध पाए जाने को अपराध साबित होने के बराबर नहीं माना जा सकता। मामले में आरोपी की भूमिका और बच्ची के लापता होने से जुड़े तथ्यों का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

Ranchi News: मां की याचिका पर हाईकोर्ट कर रहा सुनवाई

यह मामला गुमला जिले की एक बच्ची के सितंबर 2018 से लापता होने से जुड़ा है। बच्ची की मां चंद्रमुनि उराइन ने उसे खोजने और अदालत के समक्ष प्रस्तुत कराने की मांग को लेकर हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की है। हेबियस कॉर्पस एक ऐसी न्यायिक याचिका है, जिसके माध्यम से किसी लापता या कथित रूप से अवैध हिरासत में रखे गए व्यक्ति को अदालत के सामने पेश करने की मांग की जाती है।

इस मामले में मां का कहना है कि उनकी बेटी लंबे समय से लापता है। उसे खोजने के लिए पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई संतोषजनक नहीं रही। इसी वजह से उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इससे पहले भी अदालत ने पुलिस और राज्य सरकार से बच्ची की तलाश तथा अनुसंधान की प्रगति को लेकर जवाब मांगा था।

पहले भी पुलिस की जांच पर सवाल उठा चुका है हाईकोर्ट

इस मामले में हाईकोर्ट पहले भी गुमला पुलिस की जांच की गति पर सवाल उठा चुका है। जुलाई 2026 की सुनवाई में अदालत ने वर्ष 2018 से 2022 के बीच गुमला में पदस्थापित एसपी और अनुसंधानकर्ताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी राज्य सरकार से मांगी थी। उस दौरान सरकार ने मुख्य आरोपी के नार्को टेस्ट की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी भी अदालत को दी थी।

अप्रैल 2026 में भी अदालत ने बच्ची का पता लगाने के लिए राज्य सरकार को समयसीमा के भीतर जानकारी देने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने जांच में ठोस प्रगति नहीं होने पर नाराजगी जताई थी। इस मामले में विशेष जांच दल (SIT) के गठन और अलग-अलग स्थानों पर तलाश किए जाने की जानकारी भी पहले सामने आई थी।

अगली सुनवाई 17 दिसंबर को

ताजा सुनवाई में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को गृह विभाग के माध्यम से शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। गुमला एसपी को भी जांच में हुई देरी और अनुसंधान की गुणवत्ता पर अपना जवाब देना होगा। अदालत यह जानना चाहती है कि नियमित रिपोर्टिंग की व्यवस्था का पालन क्यों नहीं किया गया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा किस आधार पर हुई।

मामले की अगली सुनवाई 17 दिसंबर को निर्धारित की गई है। अब इस सुनवाई में राज्य सरकार और गुमला पुलिस की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब पर नजर रहेगी। सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है कि वर्ष 2018 से लापता बच्ची का पता कब चलेगा और जांच में हुई कथित लापरवाही की जिम्मेदारी किसकी तय होगी।

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