- खूंटी में झामुमो जिला समिति ने श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया हूल दिवस, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो को दी श्रद्धांजलि, कार्यकर्ताओं से शहीदों के आदर्शों पर चलने का आह्वान।
Jharkhand: झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) जिला समिति, खूंटी द्वारा मंगलवार को जिला अध्यक्ष जुबैर अहमद की अध्यक्षता में जिला कार्यालय में हूल दिवस श्रद्धा, सम्मान और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर महान क्रांतिकारी वीर सिदो-कान्हू, चांद-भैरव तथा फूलो-झानो के चित्रों पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर उनके ऐतिहासिक बलिदान को याद किया गया।
Jharkhand News: दिवंगत जिला सचिव सुशील पाहन को दी श्रद्धांजलि
कार्यक्रम की शुरुआत हाल ही में दिवंगत झामुमो के जिला सचिव स्वर्गीय सुशील पाहन को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुई। उपस्थित नेताओं और कार्यकर्ताओं ने दो मिनट का मौन रखकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। वक्ताओं ने कहा कि संगठन के प्रति उनका समर्पण, सादगी और संघर्ष कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
हूल दिवस आदिवासी अस्मिता और सामाजिक न्याय का प्रतीक : जुबैर अहमद
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए झामुमो जिला अध्यक्ष जुबैर अहमद ने कहा कि हूल दिवस केवल एक ऐतिहासिक स्मृति दिवस नहीं है, बल्कि यह जल, जंगल, जमीन, आदिवासी अस्मिता और सामाजिक न्याय के लिए हुए ऐतिहासिक संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि वीर शहीदों का बलिदान आने वाली पीढ़ियों को अपने अधिकारों और समाज की रक्षा के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं से शहीदों के आदर्शों पर चलकर संगठन को मजबूत बनाने और समाज की सेवा करने का आह्वान किया।
Jharkhand News: बड़ी संख्या में मौजूद रहे झामुमो नेता और कार्यकर्ता
हूल दिवस कार्यक्रम में झामुमो के केंद्रीय सदस्य भोलानाथ लाल, मकसूद अंसारी, मनोज मंडल, शंकर सिंह मुंडा, मौजीर अंसारी सहित बड़ी संख्या में पार्टी के पदाधिकारी, नेता और कार्यकर्ता उपस्थित रहे। सभी ने वीर शहीदों के बलिदान को याद करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
हूल दिवस का ऐतिहासिक महत्व
हूल दिवस हर वर्ष 30 जून को मनाया जाता है। यह दिन 1855 के संथाल हूल (विद्रोह) की याद में मनाया जाता है, जब वीर सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो ने अंग्रेजी शासन और शोषण के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन का नेतृत्व किया था। यह दिवस झारखंड सहित पूरे देश में आदिवासी स्वाभिमान, अधिकार और सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।



