- लंबे समय से पोस्टिंग का इंतजार कर रहे अधिकारियों की टिप्पणियों ने खोली सिस्टम की परतें
Ranchi: झारखंड की प्रशासनिक व्यवस्था एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार चर्चा की वजह राज्य प्रशासनिक सेवा के कुछ अधिकारियों की कथित वायरल टिप्पणियां बनी हैं, जिनमें बिना पोस्टिंग लंबे समय तक वेतन मिलने, कार्य वितरण में असमानता और प्रशासनिक तंत्र की व्यावहारिक चुनौतियों पर तीखी प्रतिक्रिया दी गई है। सोशल मीडिया और प्रशासनिक हलकों में वायरल हो रही इन टिप्पणियों ने सरकारी कार्यप्रणाली और जवाबदेही को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
“घर बैठे IPL देखो और पूरी सैलरी लो” जैसी टिप्पणी बनी चर्चा का विषय
वायरल संदेशों में कुछ अधिकारियों ने व्यंग्यात्मक अंदाज में व्यवस्था की खामियों को उजागर किया है। एक अधिकारी ने लिखा कि वह खुद को “खुशकिस्मत” मानते हैं क्योंकि लंबे समय तक पोस्टिंग नहीं मिलने के बावजूद उन्हें नियमित वेतन मिलता रहा। उन्होंने लिखा कि इस दौरान उन्होंने घूमना-फिरना किया, रिश्तेदारों से मुलाकात की और जीवन का आनंद लिया। एक अन्य टिप्पणी में कहा गया कि “घर बैठे IPL देखो और पूरी सैलरी लो” जैसी स्थिति शायद दुनिया के किसी अन्य देश में देखने को नहीं मिलेगी। इस टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर भी लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
कुछ अधिकारियों पर कई जिम्मेदारियां, कुछ बिना काम के
वायरल टिप्पणियों में यह भी कहा गया कि प्रशासनिक व्यवस्था में कार्यों का संतुलित वितरण नहीं हो पा रहा है। जहां कुछ अधिकारी महीनों तक बिना किसी जिम्मेदारी के बैठे रहते हैं, वहीं कई अधिकारियों को एक साथ दो से तीन पदों का अतिरिक्त प्रभार संभालना पड़ रहा है। अधिकारियों ने इसे प्रशासनिक संसाधनों के असंतुलित उपयोग का उदाहरण बताते हुए कहा कि इससे सरकारी कार्यों की गुणवत्ता और प्रभावशीलता प्रभावित होती है।
“संस्कृत सीखी, किताबें पढ़ीं और पूरी सैलरी मिली”
एक अधिकारी ने सात महीने तक पोस्टिंग नहीं मिलने का अनुभव साझा करते हुए लिखा कि इस दौरान उन्होंने संस्कृत भाषा सीखी, कई किताबें पढ़ीं और रिश्तेदारों से मुलाकात की, जबकि उन्हें नियमित वेतन मिलता रहा। उन्होंने भावुक अंदाज में लिखा — “हे ईश्वर, मुझे फिर से झारखंड में जन्म देना।” इस तरह की टिप्पणियों ने सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता और कार्य संस्कृति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
प्रमाण पत्रों के लिए भी पैरवी की मजबूरी पर नाराजगी
अधिकारियों ने यह भी कहा कि वर्तमान व्यवस्था में आय, जाति, आवासीय प्रमाण पत्र, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, म्यूटेशन और जमीन मापी जैसे सामान्य कार्यों के लिए भी लोगों को पैरवी करनी पड़ती है। अधिकारियों के अनुसार यह स्थिति प्रशासनिक सेवा की गरिमा और नैतिक मूल्यों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। टिप्पणियों में यह भी कहा गया कि “एथिक्स” और “एथिकल वैल्यू” की बातें व्यवहारिक जीवन में अक्सर कमजोर पड़ जाती हैं।
जाति, क्षेत्रवाद और बैच संस्कृति पर भी उठे सवाल
वायरल टिप्पणियों में प्रशासनिक सेवा के भीतर बढ़ती पहचान आधारित मानसिकता पर भी चिंता जताई गई। अधिकारियों ने कहा कि कई बार पोस्टिंग और जिम्मेदारियों को लेकर बैच, जाति, भाषा, क्षेत्रवाद और व्यक्तिगत नेटवर्क का प्रभाव देखने को मिलता है।उन्होंने माना कि ऐसी परिस्थितियां प्रशासनिक असंतुलन और कर्मचारियों के बीच असंतोष की वजह बन रही हैं।
प्रशासनिक हलकों में तेज हुई बहस
इन टिप्पणियों के सामने आने के बाद झारखंड के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। हालांकि अब तक सरकार या संबंधित विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, पदस्थापन नीति और जवाबदेही को लेकर गंभीर बहस का विषय बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते पोस्टिंग और कार्य वितरण प्रणाली में सुधार नहीं किया गया तो इससे सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
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