नवरात्रि के नौवें दिन देवी आराधना के साथ होगा हवन, हलवा-पूरी और काले चने का लगेगा भोग
Maha Navami: नवरात्रि के नौवें दिन महानवमी का पर्व मनाया जाता है। यह दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री को समर्पित है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां सिद्धिदात्री भक्तों को सिद्धि, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद देती हैं। नवरात्रि के अंतिम चरण में इस दिन विशेष पूजा-अर्चना होती है। कई घरों और मंदिरों में हवन, कन्या पूजन और भोग अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है। नौ दिनों तक चलने वाली देवी आराधना में महानवमी का विशेष स्थान है।
मां सिद्धिदात्री की पूजा का धार्मिक महत्व
मां सिद्धिदात्री को नवदुर्गा का नौवां और अंतिम स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी बताया गया है। ‘सिद्धिदात्री’ नाम का अर्थ भी सिद्धियां देने वाली देवी से जुड़ा है। भक्त इस दिन उनकी आराधना कर सुख, शांति, समृद्धि और ज्ञान की कामना करते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव को भी मां सिद्धिदात्री की कृपा से आठ सिद्धियां प्राप्त हुई थीं। इसी प्रसंग को भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। यह कथा देवी और शिव की शक्ति के एकत्व को दर्शाती है। हालांकि, ये विवरण धार्मिक ग्रंथों और परंपरागत मान्यताओं पर आधारित हैं।
महानवमी पर कन्या पूजन और हवन की परंपरा
महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा के साथ कन्या पूजन को भी विशेष महत्व दिया जाता है। इस परंपरा में छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका सम्मान किया जाता है। आमतौर पर नौ कन्याओं को आमंत्रित किया जाता है। कई स्थानों पर एक बालक को भी भैरव स्वरूप मानकर पूजन में शामिल करने की परंपरा है। कन्याओं के पैर धोए जाते हैं। इसके बाद उन्हें भोजन कराया जाता है और उपहार दिए जाते हैं। यह परंपरा नारी शक्ति के सम्मान और देवी के प्रति श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है।
कन्या पूजन की विधि परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। कुछ श्रद्धालु अष्टमी के दिन यह अनुष्ठान करते हैं। वहीं, कई परिवार महानवमी पर कन्या पूजन करते हैं। दोनों ही परंपराएं प्रचलित हैं।
पूजा में तिल, हलवा, पूरी और काले चने का भोग
मां सिद्धिदात्री की पूजा में भोग का भी विशेष स्थान है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, देवी को तिल, हलवा, पूरी, काले चने, नारियल और मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं। कई घरों में हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद तैयार किया जाता है। इसे कन्या पूजन के दौरान भी परोसा जाता है।
पूजा की शुरुआत सुबह स्नान करने और स्वच्छ वस्त्र धारण करने से होती है। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई की जाती है। कलश और अन्य पूजन सामग्री तैयार की जाती है। मां सिद्धिदात्री की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाया जाता है। फिर रोली, कुमकुम, अक्षत, धूप और फूल अर्पित किए जाते हैं। श्रद्धालु मां का ध्यान करते हुए मंत्र का जाप करते हैं।
पूजा के दौरान ‘ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः’ मंत्र का उच्चारण किया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार दुर्गा सप्तशती का पाठ भी करते हैं। इसके बाद मां की आरती होती है। कई परिवारों में पूजा के समापन पर हवन किया जाता है। इसमें मंत्रोच्चार के साथ आहुतियां दी जाती हैं। हवन को नवरात्रि के अनुष्ठानों की पूर्णता से जोड़कर देखा जाता है।
महानवमी पर हवन और व्रत के समापन की परंपरा
नवरात्रि के नौ दिनों में श्रद्धालु अपनी आस्था और सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं। महानवमी पर विशेष पूजा के बाद कई लोग व्रत का पारण करते हैं। हालांकि, पारण का समय स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार तय किया जाता है। कुछ श्रद्धालु नवमी की पूजा के बाद व्रत खोलते हैं, जबकि अन्य विजयादशमी तक प्रतीक्षा करते हैं।
हवन के दौरान अग्नि में सामग्री अर्पित की जाती है। इसके साथ देवी के मंत्रों का उच्चारण होता है। धार्मिक मान्यता है कि हवन से वातावरण की शुद्धि होती है और पूजा पूर्ण मानी जाती है। श्रद्धालु इस अवसर पर परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और शांति की कामना करते हैं। नवरात्रि के अंतिम दिनों में मंदिरों में भी विशेष पूजा और आरती का आयोजन होता है।
2026 में कब है महानवमी?
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में महानवमी सोमवार, 19 अक्टूबर को मनाई जा रही है। द्रिक पंचांग के मुताबिक, नवमी तिथि 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 51 मिनट पर शुरू होकर 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। तिथि की अवधि के कारण कुछ स्थानों पर पूजा और अनुष्ठानों के समय में अंतर हो सकता है। इसलिए कन्या पूजन, हवन और व्रत के पारण के लिए स्थानीय पंचांग का ध्यान रखना उचित है।
महानवमी केवल नवरात्रि के समापन का अवसर नहीं है। यह श्रद्धा, साधना और शक्ति उपासना से जुड़ा पर्व भी है। मां सिद्धिदात्री की पूजा, कन्या पूजन और हवन के माध्यम से श्रद्धालु नौ दिनों की आराधना पूर्ण करते हैं। इस दिन देवी से ज्ञान, विवेक, सुख और समृद्धि की कामना की जाती है।


