Anand MIshra/Jamshedpur : झारखंड की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य की सत्ता पर काबिज नेताओं को या तो शिक्षित युवाओं की पीड़ा समझ नहीं आती, या फिर वे अपने ‘राजयोग’ की खातिर जानबूझकर इसे नजरअंदाज कर रहे हैं। चुनाव आते ही शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोजगारी दूर करने के पक्के वादे तो किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर समाधान के नाम पर केवल ‘वोट बैंक’ की राजनीति ही दिखाई देती है। परिणाम यह है कि आज झारखंड का हुनरमंद युवा दूसरे राज्यों की प्रगति में अपना पसीना बहा रहा है और अपना गृह राज्य केवल एक ‘छुट्टी बिताने का स्थान’ बनकर रह गया है।
कुमार अभिषेक की ‘व्यथा-कथा’, सिर्फ एक छात्र नहीं, हर युवा का दर्द
हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर कुमार अभिषेक नामक एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को टैग करते हुए अपनी और राज्य के हजारों युवाओं की व्यथा साझा की है। अभिषेक का यह पत्र केवल एक ट्वीट नहीं, बल्कि पुणे, मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में बस चुके झारखंडी युवाओं के सामूहिक दर्द का आईना है।
कुमार अभिषेक ने मुख्यमंत्री को लिखे अपने पत्र में क्या कहा?
“आदरणीय हेमंत सोरेन सर,
मैं एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, जिसका जन्म और परवरिश झारखंड में हुई है। मुझे 12वीं के बाद ही अपना राज्य छोड़कर कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बेंगलुरु जाना पड़ा, क्योंकि झारखंड में गुणवत्तापूर्ण निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों का अभाव है। आज मैं बेंगलुरु में काम कर रहा हूँ, क्योंकि झारखंड में आज भी एक वास्तविक ‘आईटी इकोसिस्टम’ (IT Ecosystem) की कमी है।
आपकी सरकार के 6 साल बीत जाने के बाद भी मेरा सवाल है कि— आईटी पार्क कहाँ हैं? निजी क्षेत्र का निवेश कहाँ है? कुशल युवाओं के लिए प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां कहाँ हैं? एक झारखंडी युवा को बेहतर अवसर के लिए पलायन करने पर मजबूर क्यों किया जा रहा है?
मैं रांची या जमशेदपुर में काम करना चाहता हूँ। मैं अपने राज्य के विकास में योगदान देना चाहता हूँ, लेकिन आप ही बताइए कि अवसर कहाँ हैं? कड़वा सच तो यह है कि पिछली और वर्तमान, दोनों ही सरकारों ने झारखंड को बार-बार विफल किया है। न कोई दीर्घकालिक दृष्टिकोण है, न कार्यान्वयन और न ही कोई तत्परता।
दूसरी ओर, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्य लगातार नौकरियां पैदा कर रहे हैं और उद्योगों को आकर्षित कर भविष्य का निर्माण कर रहे हैं। झारखंड अभी भी पीछे क्यों है? यह केवल एक प्रश्न नहीं है, बल्कि उन हजारों शिक्षित युवाओं की कुंठा है जो अपना घर छोड़ने को मजबूर हैं। बेहतर कीजिए, झारखंड इससे बेहतर का हकदार है।”
नीतिगत शून्यता और पलायन का सिलसिला
झारखंड में खनिज संपदा की प्रचुरता के बावजूद ‘आईटी पार्क्स’ और ‘डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर’ का न होना किसी विडंबना से कम नहीं है। राज्य में उच्च शिक्षा के लिए बेहतर निजी संस्थानों की कमी छात्रों को 12वीं के बाद ही बाहर भेज देती है। एक बार जब राज्य का पैसा और प्रतिभा बाहर चले जाते हैं, तो वे वापस तभी आते हैं जब वहां रोजगार के साधन हों। परंतु, रांची और जमशेदपुर जैसे शहरों में आईटी कंपनियों के नाम पर आज भी केवल आश्वासन ही मिलते हैं।
राजनीतिक उदासीनता, क्या युवा केवल आंकड़ा हैं?
नेताओं के लिए युवा केवल ‘आंकड़ा’ हैं और महिलाएं केवल ‘वोट बैंक’। राजनीति के गलियारों में यह चर्चा आम है कि यदि ‘आधी आबादी’ का रुख किसी ओर मुड़ गया, तो पुरुषों का काफिला भी पीछे चल देगा। शायद इसीलिए लोकलुभावन योजनाएं तो धड़ाधड़ लागू की जाती हैं, लेकिन एक ‘सॉफ्टवेयर पार्क’ बनाने या ‘प्राइवेट इन्वेस्टमेंट’ लाने के लिए जरूरी इच्छाशक्ति नहीं दिखाई देती। जब तक झारखंड के विकास का पैमाना केवल सरकारी भर्तियां और खदानें रहेंगी, तब तक कुमार अभिषेक जैसे इंजीनियरों के लिए रांची या जमशेदपुर के रास्ते बंद ही रहेंगे।
अगर भविष्य में भी यही स्थिति रही, तो झारखंड केवल ‘बुजुर्गों का प्रदेश’ बनकर रह जाएगा, क्योंकि यहां का यौवन और बुद्धि तो दूसरे राज्यों की अर्थव्यवस्था चमकाने में व्यस्त है। सरकार को समझना होगा कि ‘बेहतर’ का वादा केवल भाषणों में नहीं, बल्कि धरातल पर नौकरियों और इंफ्रास्ट्रक्चर में दिखना चाहिए।



