एक ही बकाये पर बार-बार जेल भेजने पर उठाए सवाल, पति की रिहाई का आदेश
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने भरण-पोषण की राशि का भुगतान नहीं होने पर पति को लगातार जेल में रखने के मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने दुमका फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत दशरथ सिंह की हिरासत लगातार 30-30 दिनों के लिए बढ़ाई जा रही थी। हाईकोर्ट ने उन्हें तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125(3) के तहत भरण-पोषण की राशि के भुगतान में चूक पर जेल भेजने की कार्रवाई कानून के दायरे में होनी चाहिए। एक ही बकाये के लिए बार-बार हिरासत बढ़ाना उचित नहीं है।
Ranchi News: 31 मार्च 2023 को तय हुई थी भरण-पोषण की राशि
मामले के अनुसार, दशरथ सिंह की पत्नी ने अपने और अपनी नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए दुमका फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने अपने लिए आठ हजार रुपये और बेटी के लिए तीन हजार रुपये प्रतिमाह देने की मांग की थी। इस मामले में प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, दुमका ने 31 मार्च 2023 को आदेश पारित किया। इसमें दशरथ सिंह को पत्नी के लिए पांच हजार रुपये और बेटी के लिए तीन हजार रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया गया। इस तरह कुल आठ हजार रुपये मासिक भरण-पोषण निर्धारित हुआ। यह राशि 31 अगस्त 2021 से देय थी।
भुगतान नहीं होने पर दायर हुई निष्पादन याचिका
फैमिली कोर्ट के आदेश के बावजूद भरण-पोषण की राशि नहीं मिलने पर पत्नी ने 15 मई 2023 को निष्पादन याचिका दायर की। इसका उद्देश्य अदालत के आदेश का पालन कराना और बकाया राशि की वसूली करना था। इसके बाद दशरथ सिंह को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया। उनके खिलाफ 30-30 दिनों की अवधि के लिए जेल भेजने के आदेश पारित होने लगे। मामला आगे बढ़ने के साथ हिरासत की अवधि लगातार बढ़ती रही। अंततः पति ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
Ranchi News: 23 बार बढ़ाई गई हिरासत को हाईकोर्ट में दी चुनौती
दशरथ सिंह की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका में कहा गया कि फैमिली कोर्ट ने 23 बार 30-30 दिनों के लिए उनकी हिरासत बढ़ाने के आदेश दिए। याचिकाकर्ता के मुताबिक, इस पूरी अवधि में उन्हें एक दिन के लिए भी रिहा नहीं किया गया। उन्होंने यह भी दलील दी कि कई आदेशों में उस महीने या अवधि का स्पष्ट उल्लेख नहीं था, जिसके बकाये के कारण उन्हें जेल में रखा जा रहा था। उनकी ओर से कहा गया कि सितंबर 2021 के बकाये के लिए भी उन्हें कई बार हिरासत में भेजा गया।
दशरथ सिंह ने फैमिली कोर्ट में रिहाई के लिए आवेदन दिया था। हालांकि, 16 अप्रैल 2026 को अदालत ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट में उनकी ओर से लगातार हिरासत में रखे जाने की वैधता पर सवाल उठाए गए।
पत्नी ने कहा, अब तक नहीं मिली भरण-पोषण की राशि
सुनवाई के दौरान पत्नी की ओर से भी अपना पक्ष रखा गया। उनके अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उन्हें अब तक भरण-पोषण की कोई राशि नहीं मिली है। इसी आधार पर उन्होंने फैमिली कोर्ट के आदेश को उचित बताया। पत्नी की ओर से आग्रह किया गया कि पति को बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया जाए। मामले में अदालत के सामने एक ओर भरण-पोषण की राशि नहीं मिलने का मुद्दा था, तो दूसरी ओर भुगतान में चूक के कारण लगातार हिरासत में रखे जाने की वैधता का सवाल था।
धारा 125(3) के प्रावधानों पर अदालत ने दिया जोर
हाईकोर्ट ने मामले में फैमिली कोर्ट के आदेशों की समीक्षा की। अदालत ने पाया कि 23 अलग-अलग आदेशों के जरिए दशरथ सिंह की हिरासत लगातार 30-30 दिनों के लिए बढ़ाई गई थी। हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को सीआरपीसी की धारा 125(3) के वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं माना।
इस धारा के तहत भरण-पोषण के आदेश का पालन नहीं होने पर बकाया राशि की वसूली के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इसमें प्रत्येक उल्लंघन के संदर्भ में एक महीने तक की कैद का प्रावधान है। हालांकि, इसकी व्याख्या करते समय यह देखना जरूरी है कि बकाया किस अवधि का है और अदालत ने किस आधार पर हिरासत का आदेश दिया है। अलग-अलग महीनों के बकाये और एक ही बकाये के लिए बार-बार हिरासत बढ़ाने के सवाल कानूनी रूप से अलग हैं।
हाईकोर्ट ने आदेश रद्द कर तत्काल रिहाई का निर्देश दिया
मामले में सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने दुमका फैमिली कोर्ट के 16 अप्रैल 2026 के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने दशरथ सिंह को तत्काल जेल से रिहा करने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह भी बताया गया कि रिहाई के बाद वह भरण-पोषण की कुछ राशि का भुगतान करने का प्रयास करेगा।
हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली और मामले का निष्पादन कर दिया। फैसले से यह स्पष्ट होता है कि भरण-पोषण की राशि की वसूली के लिए की जाने वाली कार्रवाई भी कानून में तय सीमाओं और प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। हालांकि, पति की रिहाई के आदेश को भरण-पोषण की देनदारी समाप्त होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। बकाया राशि के भुगतान का सवाल अलग है और उस पर संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई हो सकती है।
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