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Jharkhand News: बाल बजट का 46% से ज्यादा पैसा खर्च नहीं

महालेखाकार के ऑडिट में खुलासा, 2024-25 में 8,866.69 करोड़ रुपये के प्रावधान में से 4,803.01 करोड़ ही हुए खर्च

Jharkhand News: झारखंड में बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण के लिए बनाए गए बाल बजट की पूरी राशि खर्च नहीं हो पा रही है। महालेखाकार के ऑडिट में वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान बाल बजट के खर्च में बड़ी कमी सामने आई है। सरकार ने इस वित्तीय वर्ष में बाल बजट के लिए 8,866.69 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। इसके मुकाबले सिर्फ 4,803.01 करोड़ रुपये खर्च हुए। यह कुल बजट का 54.16 प्रतिशत है। यानी निर्धारित राशि का करीब 45.84 प्रतिशत खर्च नहीं हो सका। ऑडिट में बजट के लेखांकन और योजनाओं की पहचान से जुड़ी खामियां भी सामने आई हैं। इससे बाल बजट के तहत आवंटित राशि और वास्तविक खर्च का स्पष्ट आकलन करने में परेशानी हुई।

Jharkhand News: बाल बजट के लेखांकन में मिलीं खामियां

महालेखाकार ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के बाल बजट का ऑडिट किया। इस दौरान बजट में खर्च का हिसाब रखने की व्यवस्था में कई समस्याएं मिलीं। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने बाल बजट में खर्च के लिए विशिष्ट लेखा शीर्ष (Specific Head of Account) का उल्लेख नहीं किया था। इसके अलावा, बाल बजट में दर्ज कुछ योजनाओं के नाम सामान्य बजट में दिए गए नामों से मेल नहीं खाते थे।

इन खामियों के कारण योजनाओं पर हुए खर्च का सीधा मिलान करना मुश्किल था। ऐसे में ऑडिट टीम ने विभिन्न उपशीर्षों (Sub-heads) के आधार पर खर्च के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इस प्रक्रिया से बजट प्रावधान और वास्तविक खर्च के बीच का अंतर सामने आया। लेखांकन में स्पष्टता की कमी से यह भी चुनौती पैदा होती है कि बच्चों के कल्याण के लिए निर्धारित राशि का इस्तेमाल किस योजना में और किस स्तर पर हुआ, इसका सटीक आकलन किया जा सके।

Jharkhand News: चार विभागों के बजट में खर्च का अंतर

बाल बजट 2024-25 में चार विभागों के लिए राशि निर्धारित की गई थी। इनमें स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग तथा नगर विकास एवं आवास विभाग शामिल थे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चारों विभागों के खर्च की स्थिति अलग-अलग रही।

स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के लिए 3,143.88 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। इसमें से 1,018.84 करोड़ रुपये खर्च हुए। यह कुल प्रावधान का 32.40 प्रतिशत है। चारों विभागों में इस विभाग का खर्च निर्धारित बजट के मुकाबले सबसे कम रहा।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के लिए 1,818.86 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। इसमें से 1,466.86 करोड़ रुपये खर्च हुए। इस तरह विभाग ने अपने बजट का 80.64 प्रतिशत इस्तेमाल किया। महिला एवं बाल विकास विभाग के लिए 1,993.07 करोड़ रुपये का प्रावधान था। इसमें से 1,044.19 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो कुल बजट का 52.39 प्रतिशत है।

वहीं, नगर विकास एवं आवास विभाग के लिए 1,881.50 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए थे। इसमें से 1,243.74 करोड़ रुपये खर्च हुए। यह राशि बजट प्रावधान का 66.10 प्रतिशत है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अलग-अलग विभागों में बाल बजट के इस्तेमाल की स्थिति एक जैसी नहीं रही।

 2025-26 में खर्च को लेकर सरकार का दावा

वित्तीय वर्ष 2025-26 में झारखंड सरकार ने बाल बजट के लिए 9,411.27 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। इसके बाद वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में यह राशि बढ़ाकर 10,793.16 करोड़ रुपये कर दी गई। राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट भाषण में पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान बाल बजट पर 6,939 करोड़ रुपये खर्च होने का दावा किया।

हालांकि, महालेखाकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के बाल बजट का ऑडिट नहीं किया है। इस वजह से सरकार की ओर से बताए गए खर्च की स्वतंत्र ऑडिट के आधार पर पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए 2025-26 के खर्च के आंकड़ों को सरकार के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए। आधिकारिक ऑडिट के अभाव में इसकी तुलना पिछले वर्षों के सत्यापित खर्च से सावधानीपूर्वक करनी होगी।

जनगणना 2011 के आंकड़ों से तैयार हुआ बाल बजट

वित्तीय वर्ष 2024-25 का बाल बजट तैयार करने के लिए सरकार ने जनगणना 2011 के आंकड़ों को आधार बनाया था। इन आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों की आबादी करीब 1.46 करोड़ थी। यह राज्य की कुल आबादी का 44.25 प्रतिशत थी। इनमें 75.66 लाख लड़के और 70.34 लाख लड़कियां शामिल थीं।

बजट तैयार करते समय राज्य की अनुमानित जनसंख्या वृद्धि दर को ध्यान में रखते हुए बच्चों की संख्या का अनुमान लगाया गया। इसके आधार पर लड़कों की संख्या करीब 92 लाख और लड़कियों की संख्या करीब 86 लाख मानी गई। इसी अनुमान के आधार पर बच्चों के लिए विभिन्न योजनाओं में बजट का प्रावधान किया गया।

हालांकि, जनगणना के पुराने आंकड़ों और अनुमानित आबादी के आधार पर योजनाओं की जरूरत तय करने के साथ-साथ समय-समय पर वास्तविक जरूरतों का आकलन करना भी जरूरी है। बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं, यह जानने के लिए खर्च और परिणामों की नियमित समीक्षा महत्वपूर्ण है।

बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए शुरू हुआ था बाल बजट

बाल बजट की अवधारणा बच्चों के अधिकारों और उनके समग्र विकास को प्राथमिकता देने से जुड़ी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 20 नवंबर 1989 को बाल अधिकारों पर कन्वेंशन को अपनाया था। इसका उद्देश्य बच्चों के जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा, विकास और संरक्षण से जुड़े अधिकारों को सुनिश्चित करना है।

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए झारखंड सरकार ने वित्तीय वर्ष 2019-20 में पहली बार अलग बाल बजट पेश किया था। उस समय इसके लिए 6,182.44 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। इसके बाद कोविड-19 महामारी से प्रभावित दो वित्तीय वर्षों में अलग बाल बजट पेश नहीं किया गया। बाद के वर्षों में बजट भाषणों में बच्चों के कल्याण से जुड़ी विभिन्न विभागीय योजनाओं का उल्लेख किया जाता रहा।

वित्तीय वर्ष 2024-25 से सरकार ने मूल बजट के साथ अलग से बाल बजट पेश करना फिर शुरू किया। इसके जरिए बच्चों से संबंधित योजनाओं के लिए निर्धारित राशि को एक जगह प्रस्तुत करने की व्यवस्था की गई।

बाल बजट के चार प्रमुख सिद्धांत

बाल अधिकारों से जुड़े चार प्रमुख सिद्धांतों में भेदभाव से सुरक्षा, बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता, जीवन एवं विकास का अधिकार और बच्चों के विचारों को सम्मान देना शामिल है। इन सिद्धांतों के अनुसार, हर बच्चे को समान अवसर मिलना चाहिए। उसके स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, बच्चों की जरूरतों और विचारों को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

झारखंड में बाल बजट का उद्देश्य इन अधिकारों से जुड़ी योजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना है। लेकिन बजट में राशि निर्धारित करना ही पर्याप्त नहीं है। उसका समय पर खर्च होना और योजनाओं का लाभ बच्चों तक पहुंचना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

महालेखाकार के ऑडिट में सामने आए आंकड़े इसी दिशा में खर्च की निगरानी और लेखांकन व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताते हैं। बजट के अलग-अलग मदों में स्पष्टता, योजनाओं के नामों का सही मिलान और नियमित ऑडिट से खर्च का आकलन बेहतर हो सकता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि बच्चों के लिए निर्धारित धन का कितना हिस्सा वास्तव में उनके विकास और कल्याण पर इस्तेमाल हो रहा है।

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