Mander MGNREGA Scam: हाईकोर्ट ने बीपीओ सुष्मिता प्रिया की अर्जी ठुकराई
Mander MGNREGA Scam: रांची (विशेष संवाददाता)। झारखंड उच्च न्यायालय ने रांची(Ranchi) जिले के मांडर प्रखंड में मनरेगा योजना के तहत वित्तीय गड़बड़ी के आरोपी पूर्व ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर (बीपीओ) सुष्मिता प्रिया उर्फ सुष्मिता गुप्ता की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के उस आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसमें आरोपी अधिकारी की डिस्चार्ज अर्जी निरस्त कर दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केस डायरी और जांच रिपोर्ट में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं, इसलिए ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने की कोई जरूरत नहीं है।
Mander MGNREGA Scam: सरकारी फंड के गबन का क्या है पूरा मामला
यह पूरा विवाद मांडर थाना कांड संख्या 109/2018 से जुड़ा हुआ है। उप विकास आयुक्त (डीडीसी) कार्यालय द्वारा 3 जनवरी 2018 को जारी पत्र के बाद एक विशेष जांच कराई गई थी। जांच के दौरान पता चला कि वित्तीय वर्ष 2010-11 में मनरेगा योजना के तहत लाभुक जलेश्वर लोहरा के नाम पर ट्यूबवेल निर्माण के लिए 3,11,244 रुपये स्वीकृत किए गए थे।
जांच में खुलासा हुआ कि स्थल पर नियमानुसार कोई काम पूरा नहीं किया गया। इसके बावजूद फर्जी तरीके से पूरी राशि की निकासी कर ली गई। इस मामले में पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 406 (विश्वासघात) और 409 (सरकारी सेवक द्वारा आपराधिक अमानत में खयानत) के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। पुलिस ने गहन छानबीन के बाद अदालत में चार्जशीट दाखिल की। इसके बाद निचली अदालत ने धारा 406, 420 और 409 के तहत मामले पर संज्ञान लिया था।
याचिकाकर्ता की ओर से दी गई दलीलें
सुनवाई के दौरान आरोपी सुष्मिता प्रिया के अधिवक्ता ने अदालत में पक्ष रखा कि याचिकाकर्ता मार्च 2010 से सितंबर 2012 तक संविदा के आधार पर ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर के पद पर तैनात थीं। योजना की स्वीकृति के दौरान लाभुक को ही मेठ नियुक्त किया गया था।
बचाव पक्ष का कहना था कि 19 अक्टूबर 2016 को किए गए संयुक्त निरीक्षण में यह पाया गया कि ट्यूबवेल तय स्थान के बजाय किसी अन्य व्यक्ति की जमीन पर गाड़ दिया गया था। इसके बाद प्रशासन ने जिम्मेदार लोगों से राशि वसूलने का आदेश जारी किया था। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि निर्माण की सीधी निगरानी, स्थल का मुआयना और मजदूरी भुगतान की जिम्मेदारी मेठ की होती है। वहीं जमीन के सही सत्यापन का जिम्मा जूनियर इंजीनियर और हल्का कर्मचारी का था। बीपीओ की इसमें कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी, इसलिए उन्हें इस केस से बरी किया जाना चाहिए।
राज्य सरकार का विरोध और उच्च न्यायालय का कड़ा रुख
राज्य सरकार ने बचाव पक्ष के तर्कों का पुरजोर विरोध किया। सरकारी वकील ने कहा कि बीपीओ होने के नाते याचिकाकर्ता पूरी योजना की पर्यवेक्षण अधिकारी (सुपरवाइजरी ऑफिसर) थीं। इसलिए फंड में हुई गड़बड़ी के लिए उनकी सीधी जवाबदेही बनती है।
उच्च न्यायालय ने केस डायरी और 30 दिसंबर 2016 की संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट की समीक्षा की। अदालत ने पाया कि जांच रिपोर्ट में याचिकाकर्ता को भी लापरवाही और अनियमितता का दोषी ठहराया गया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर का मुख्य काम चल रही योजनाओं की निरंतर निगरानी और पर्यवेक्षण करना है। याचिकाकर्ता अपने इस दायित्व को निभाने में विफल रहीं, जिसके कारण 3.11 लाख रुपये से अधिक का गबन हुआ। कई गवाहों के बयानों से भी उनकी भूमिका उजागर हुई है। अदालत ने निचली अदालत के फैसले को सही मानते हुए डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के आदेश पर मुहर लगा दी।
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