एसीबी की प्रारंभिक जांच पर झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
ACB Preliminary Investigation: झारखंड हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी एसीबी(ACB) में लंबित मामलों को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में प्रारंभिक जांच को अब अनिश्चितकाल तक लटका कर नहीं रखा जा सकता है। चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति एमएस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश दिया है। अदालत के इस फैसले से राज्य के प्रशासनिक गलियारों में हलचल मच गई है। कई मामलों में जांच एक दशक से भी ज्यादा समय से लंबित थी, जिस पर कोर्ट ने गहरी चिंता जताई है।
ACB Preliminary Investigation: एसीबी में अटकी हैं 216 प्रारंभिक जांच, कई मामले एक दशक से पेंडिंग
राज्य सरकार की तरफ से कोर्ट में जो रिपोर्ट सौंपी गई, उसके मुताबिक एसीबी में कुल 216 प्रारंभिक जांच अभी पेंडिंग पड़ी हुई हैं। इनमें से 43 मामलों की जांच पूरी हो चुकी है। हैरानी की बात यह है कि एफआईआर दर्ज करने की अनुमति या फिर आगे के निर्देश के लिए ये फाइलें कैबिनेट और संबंधित मंत्रियों के स्तर पर अटकी हुई हैं। इन 43 मामलों में से 23 फाइलें तो ऐसी हैं जो दिसंबर 2025 से पहले की लंबित हैं। इसके अलावा, बाकी बचे 173 मामलों की जांच अभी खुद एसीबी के स्तर पर ही चल रही है। अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि कई जांच तो पिछले दस सालों से धूल फांक रही हैं।
ACB Preliminary Investigation: जांच पूरी करने और अनुमति देने के लिए तय हुई सख्त समयसीमा
हाईकोर्ट ने इस समस्या के समाधान के लिए अब स्पष्ट और कड़ी समयसीमा तय कर दी है। कोर्ट के नए निर्देश के मुताबिक, किसी भी प्रारंभिक जांच को सामान्य तौर पर तीन महीने के भीतर पूरा करना होगा। अगर जांच की अवधि बढ़ाने की सख्त जरूरत पड़ी, तो एसीबी प्रमुख इसके लिए विस्तार दे सकेंगे, लेकिन हर हाल में छह महीने के अंदर जांच को पूरा करने का पूरा प्रयास करना होगा। अगर छह महीने से ज्यादा वक्त लगता है, तो एसीबी चीफ को इसके ठोस कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे। इसके साथ ही, जिन मामलों में जांच पूरी हो चुकी है और फाइलें सक्षम प्राधिकारी के पास अनुमति के लिए पड़ी हैं, उन पर भी तीन महीने के भीतर फैसला लेना अनिवार्य कर दिया गया है।
छह महीने बाद देनी होगी स्टेटस रिपोर्ट, त्वरित न्याय पर जोर
अदालत ने अपने आदेश में यह भी साफ किया है कि जरूरत पड़ने पर लिखित कारण के साथ एक महीने का अतिरिक्त समय लिया जा सकता है। एसीबी के महानिदेशक को यह निर्देश दिया गया है कि फैसले की तारीख से छह महीने पूरे होने के बाद वे हाईकोर्ट में एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करें। इस रिपोर्ट में हर एक लंबित मामले का पूरा कच्चा-चिट्ठा देना होगा। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि लंबी देरी से न सिर्फ आपराधिक न्याय व्यवस्था कमजोर होती है, बल्कि किसी बेकसूर को सालों तक शक के दायरे में रखना उसकी प्रतिष्ठा और सेवाकाल के लिए भी नुकसानदेह है। इसलिए सार्वजनिक हित और त्वरित न्याय के बीच संतुलन बनाना बहुत जरूरी है।
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