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Jamshedpur Air Pollution: हवा की निगरानी पर उठे सवाल

आरटीआई के जवाब में खुलासा, शहर में रियल-टाइम AQI डिस्प्ले और PM2.5 की नियमित निगरानी नहीं होने की बात आई सामने

Jamshedpur Air Pollution: लौहनगरी जमशेदपुर में वायु प्रदूषण की निगरानी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मिले जवाब में झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद ने शहर में वायु गुणवत्ता की निगरानी से जुड़ी कई कमियों की जानकारी दी है। जवाब के मुताबिक, जमशेदपुर में रियल-टाइम एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) डिस्प्ले की व्यवस्था नहीं है। वहीं, सबसे महत्वपूर्ण प्रदूषकों में शामिल पीएम2.5 की नियमित निगरानी भी नहीं की जाती। प्रदूषण के स्रोतों और लोगों के स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव को लेकर विस्तृत अध्ययन नहीं होने की जानकारी भी सामने आई है। इससे शहर में वायु प्रदूषण की वास्तविक स्थिति का आकलन करने और समय रहते जरूरी कदम उठाने की व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं।

Jamshedpur Air Pollution: आरटीआई के जवाब में क्या जानकारी मिली?

झारखंड मानवाधिकार संगठन (जेएचआरसी) के चेयरमैन मनोज मिश्रा ने 7 जुलाई 2026 को आरटीआई आवेदन देकर जमशेदपुर की वायु गुणवत्ता से जुड़ी जानकारी मांगी थी। इसमें पिछले एक महीने के दैनिक AQI, पीएम2.5, पीएम10, सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) समेत विभिन्न प्रदूषकों के आंकड़े मांगे गए थे। इसके अलावा निगरानी केंद्रों, प्रदूषण के स्रोतों, स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों और नियंत्रण के लिए की गई कार्रवाई का ब्योरा भी मांगा गया था।

पर्षद के जन सूचना पदाधिकारी मोहम्मद आफताब आलम ने 3 अगस्त 2026 को पत्र संख्या 1127 के जरिए जवाब दिया। इसके साथ अप्रैल 2026 की निगरानी से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराए गए। हालांकि, मांगी गई सभी जानकारियां नहीं मिलीं। जवाब में मुख्य रूप से पीएम10, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड की निगरानी का उल्लेख था। दैनिक AQI और पीएम2.5 के नियमित आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए गए।

Jamshedpur Air Pollution: निगरानी के आंकड़ों में कई जगह अधिक दर्ज हुआ कणीय प्रदूषण

आरटीआई के जवाब में उपलब्ध अप्रैल के आंकड़ों के अनुसार, कुछ दिनों में श्वसनीय निलंबित कणीय पदार्थ (RSPM) और कुल निलंबित कणीय पदार्थ (TSPM) का स्तर काफी अधिक दर्ज किया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, आवासीय-सह-व्यावसायिक क्षेत्र में RSPM का स्तर 86 से 175.33 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और TSPM का स्तर 176 से 358 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच रहा। औद्योगिक क्षेत्र में RSPM 94.25 से 161.37 और TSPM 195 से 330 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच दर्ज किया गया।

हालांकि, RSPM और TSPM के आंकड़ों को पीएम10 और पीएम2.5 के मानकों के समान मानना सही नहीं होगा। प्रदूषण के स्तर का वैज्ञानिक आकलन संबंधित प्रदूषक, नमूना लेने की अवधि और निर्धारित मानक के आधार पर किया जाता है। उपलब्ध आंकड़े निगरानी व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत जरूर दर्शाते हैं।

दो केंद्रों पर मैनुअल निगरानी, रोजाना जांच नहीं

पर्षद के 30 सितंबर 2026 के पत्र संख्या 1387 के जवाब में जमशेदपुर की निगरानी व्यवस्था से संबंधित अतिरिक्त जानकारियां सामने आईं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, शहर में गोपाल मैदान, बिष्टुपुर और गोलमुरी स्थित दो केंद्रों पर प्रदूषकों की मैनुअल निगरानी की जाती है। ये केंद्र क्रमशः आवासीय सह व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इन केंद्रों पर सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कणीय प्रदूषण की जांच होती है। लेकिन यह निगरानी हर दिन नहीं की जाती। ऐसे में प्रदूषण के स्तर में होने वाले दैनिक उतार-चढ़ाव की पूरी तस्वीर सामने लाने में कठिनाई हो सकती है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की जमशेदपुर संबंधी कार्ययोजना में भी शहर की वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए दो मैनुअल केंद्रों का उल्लेख है। रिपोर्ट में औद्योगिक विस्तार, निर्माण गतिविधियों और वाहनों की बढ़ती संख्या को क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियों में शामिल किया गया है।

पीएम2.5 की नियमित निगरानी नहीं होने से अधूरी रह सकती है तस्वीर

आरटीआई के जवाब के मुताबिक, पीएम2.5 की निगरानी मुख्य रूप से दिवाली के दौरान CPCB के निर्देश पर किए जाने की जानकारी दी गई है। वर्ष के बाकी समय इसकी नियमित निगरानी नहीं होने की बात सामने आई है। पीएम2.5 के कण बेहद महीन होते हैं। ये सांस के जरिए फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों में लंबे समय तक कणीय प्रदूषण के संपर्क को सांस संबंधी बीमारियों और हृदय रोगों के बढ़ते जोखिम से जोड़ा गया है। बच्चे, बुजुर्ग और पहले से सांस या हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोग इसके प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। ऐसे में किसी औद्योगिक शहर के लिए पीएम2.5 की नियमित निगरानी महत्वपूर्ण है। इसके आंकड़े प्रदूषण की स्थिति समझने और जरूरत के मुताबिक नियंत्रण के उपाय तय करने में मदद करते हैं।

प्रदूषण के स्रोतों का विस्तृत अध्ययन भी नहीं

आरटीआई के जवाब में प्रदूषण के स्रोतों की पहचान को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। पर्षद के मुताबिक, वाहनों की अधिक संख्या को प्रदूषण का एक संभावित कारण बताया गया, लेकिन इसके समर्थन में किसी विस्तृत सर्वेक्षण या वैज्ञानिक अध्ययन का उल्लेख नहीं किया गया। वाहनों से निकलने वाले धुएं, सड़क की धूल और औद्योगिक उत्सर्जन का अलग-अलग योगदान जानने के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी होता है। इसे स्रोत निर्धारण अध्ययन या सोर्स अपॉर्शनमेंट स्टडी कहा जाता है।

विशेषज्ञों की मानें, तो इससे पता चलता है कि किसी क्षेत्र में प्रदूषण के लिए कौन-कौन से स्रोत कितनी भूमिका निभा रहे हैं। उपलब्ध आरटीआई विवरण के अनुसार, जमशेदपुर में इस तरह का विस्तृत अध्ययन नहीं कराया गया है। इसका अर्थ यह है कि प्रदूषण के विभिन्न स्रोतों के योगदान का आकलन करने के लिए और वैज्ञानिक जानकारी जुटाने की जरूरत बनी हुई है।

बच्चों, बुजुर्गों और सांस के मरीजों की सेहत पर चिंता

आरटीआई के जवाब में यह भी बताया गया कि आम लोगों, बच्चों, बुजुर्गों और श्वसन रोगियों पर वायु प्रदूषण के प्रभाव का कोई विशिष्ट स्वास्थ्य आकलन नहीं कराया गया है। इससे स्थानीय स्तर पर प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बीच संबंध को समझने के लिए उपलब्ध जानकारी सीमित रह जाती है।

हालांकि, स्वास्थ्य प्रभावों का स्थानीय अध्ययन नहीं होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि प्रदूषण से कोई नुकसान नहीं हो रहा। इसी तरह, केवल निगरानी संबंधी कमियों के आधार पर पूरे शहर की हवा को हर समय खतरनाक घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए नियमित वायु गुणवत्ता के आंकड़ों और वैज्ञानिक स्वास्थ्य अध्ययनों की जरूरत होती है।

साफ हवा के अधिकार को लेकर उठे सवाल

वायु प्रदूषण की निगरानी में सामने आई कमियों ने पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार को लेकर बहस तेज कर दी है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। न्यायिक व्याख्याओं में स्वच्छ पर्यावरण को भी गरिमापूर्ण जीवन के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया है।

ऐसे में प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उपलब्ध संसाधनों के अनुसार नियमित निगरानी करे, आंकड़ों को पारदर्शी बनाए और प्रदूषण के स्रोतों की पहचान कर जरूरी कदम उठाए। जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहर में इन व्यवस्थाओं को मजबूत करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

मनोज मिश्रा ने आंदोलन की चेतावनी दी

झारखंड मानवाधिकार संगठन के चेयरमैन मनोज मिश्रा ने पर्षद के जवाब पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि शहर में वायु गुणवत्ता की नियमित और वैज्ञानिक निगरानी होनी चाहिए। उन्होंने मांग की कि प्रदूषण के स्रोतों और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कराया जाए। मिश्रा के मुताबिक, संगठन इस मुद्दे को लेकर जनहित में आंदोलन करेगा और जरूरत पड़ने पर न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाएगा।

फिलहाल, आरटीआई के जवाब से सामने आई जानकारी ने जमशेदपुर में वायु प्रदूषण की निगरानी व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत को रेखांकित किया है। नियमित आंकड़े, पारदर्शी रिपोर्टिंग और वैज्ञानिक अध्ययन ही यह स्पष्ट कर सकते हैं कि शहर की हवा की स्थिति क्या है और प्रदूषण को कम करने के लिए किन उपायों की सबसे अधिक जरूरत है।

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