Supreme Court RTE PI : देश के हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में उच्चतम न्यायालय ने एक बड़ा कदम उठाया है। सोमवार को शीर्ष अदालत ने शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 को प्रभावी ढंग से लागू करने और नई शिक्षा नीति (NEP) के क्रियान्वयन को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब तलब किया है।
“हम इस मुद्दे पर गौर करना चाहेंगे”: प्रधान न्यायाधीश
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता हरिप्रिया पटेल की दलीलों को गंभीरता से सुना। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रधान न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि न्यायालय इस महत्वपूर्ण विषय की विस्तृत समीक्षा करना चाहता है। पीठ ने कहा, “हम नोटिस जारी कर रहे हैं और इस मुद्दे के हर पहलू पर गौर करेंगे।”
प्री-प्राइमरी शिक्षा और NEP 2020 पर जोर
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत के समक्ष कई गंभीर बिंदु रखे। दलीलों में मुख्य रूप से निम्नलिखित मुद्दों पर ध्यान आकर्षित किया गया:
पूर्व-प्राथमिक शिक्षा: देश भर में छोटे बच्चों के लिए प्री-प्राइमरी शिक्षा के ढांचे को सुदृढ़ और अनिवार्य बनाना।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020: कौशल विकास और समग्र शिक्षा पर आधारित नई शिक्षा नीति को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रभावी ढंग से लागू करना।
लचीलापन और रूपांतरण: शिक्षा प्रणाली को अधिक लचीला और रोजगारोन्मुख बनाने के लिए एनईपी के व्यापक ढांचे को धरातल पर उतारना।
RTE कानून का पूर्ण क्रियान्वयन है अनिवार्य
जनहित याचिका में वर्ष 2009 के नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा (आरटीई) अधिनियम के पूर्ण क्रियान्वयन की मांग की गई है। यह कानून 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए न केवल मुफ्त शिक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि पड़ोस के स्कूलों में उनकी मूलभूत शिक्षा की गारंटी भी देता है। साथ ही, यह निजी विद्यालयों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना अनिवार्य बनाता है।
केंद्र और सभी राज्य बने पक्षकार
इस याचिका की व्यापकता को देखते हुए केंद्र सरकार के साथ-साथ देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसमें पक्षकार बनाया गया है। अब सभी सरकारों को यह बताना होगा कि उनके क्षेत्र में आरटीई और नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की वर्तमान स्थिति क्या है और इसमें देरी के क्या कारण हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से देश की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा प्रणाली में जवाबदेही बढ़ेगी और हाशिए पर खड़े बच्चों को उनका संवैधानिक अधिकार मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा।



